राज्य सरकार ने लिया निर्णय
बीकानेर। दो जुलाई से शुरू हो रही अन्नपूर्णा दूध योजना की लॉन्चिंग से पहले राज्य सरकार ने फैसला किया है कि छात्रों को देने से पहले शिक्षक और माता-पिता दूध चखेंगे। दूध तभी वितरित किया जाएगा जब इसे चखने वाले इसकी गुणवत्ता परखते हुए स्वीकृति देंगे।
मानदंड के अनुसार सभी प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को सर्व करने से पहले एक शिक्षक और एक माता या पिता को दूध चखना होगा और इसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी।
जानकारी के मुताबिक यह कदम तब उठाया गया जब राज्य शिक्षा विभाग ने सूचित किया कि दूध में मिलावट खरीदी से वितरण तक किसी भी स्तर पर हो सकती है।
बताया जा रहा है कि माता-पिता को शामिल करके, सरकार ने उन्हें दूध की गुणवत्ता जांच में समान रूप से जिम्मेदार बना दिया है। अब दूध की गुणवत्ता को बनाए रखने का काम सभी हितधारकों पर है। अगर कोई भी इसकी गुणवत्ता पर आपत्ति जताता है तो दूध का नमूना लेकर उसकी जांच की जाएगी।
स्कूल प्रबंधन समिति की जांच के लिए माता-पिता के चयन की जिम्मेदारी है। स्कूल को माता-पिता और शिक्षकों का रजिस्टर मैनटेन करना होगा।
विभाग ने दूध की गुणवत्ता की जांच के लिए दो स्तरीय प्रणाली जरूरी मानी है। इसके अंतर्गत सप्लाई पॉइंट पर दूध का फैट और लैक्टोजन कंटेंट पहले चेक किया जाता है। एक बार दूध स्कूल पहुंच जाता है तो यूरिया और स्टार्च कंटेंट चेक किया जाता है यह जानने के लिए कि दूध की गुणवत्ता बदली तो नहीं, जो कि सप्लाई पॉइंट पर जांची गई थी।
जिला शिक्षा अधिकारी, खाद्य निरीक्षक और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की ओर से स्कूलों में औचक निरीक्षण किया जाएगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दिया जा रहा दूध सुरक्षित और स्वस्थ है।
गौरतलब है कि प्रदेशभर में 2 जुलाई से अन्नपूर्णा दूध योजना शुरू की जा रही है। जिसके तहत राजकीय विद्यालयों में कक्षा एक से आठ तक के छात्रों को पोषाहार के साथ दूध भी दिया जाएगा। इस योजना के तहत कक्षा एक से पांच तक के बच्चों को 150 एमएसल और कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों को 200 एमएल दूध स्कूलों में दिया जाएगा।











