लगने लगे सियासी नफा-नुकसान के कयास

निष्कासन से पहले तिवाड़ी ने क्यों छोड़ी भाजपा !

जयपुर। आपातकाल की बरसी पर दिग्गज नेता घनश्याम तिवाड़ी के पार्टी छोड़ने पर सियासी नफा-नुकसान के कयास लगने शुरू हो गए हैं। पार्टी में तिवाड़ी की बगावत तो जगजाहिर थी लेकिन निष्कासित होने से पहले उन्होंने पार्टी से इस्तीफा क्यों दिया? यह सवाल कल से ही सियासी हलकों में छाया हुआ है।

छह बार विधायक और प्रदेश की भैरोंसिंह शेखावत तथा वसुन्घरा राजे की सरकार में दो बार मंत्री रह चुके तिवाड़ी का इस्तीफा भाजपा के लिए एक झटका है। हालांकि भाजपा नेता इसे साफ-तौर पर तवज्जों नहीं दे रहे हैं लेकिन तिवाड़ी के पार्टी छोड़ने के वक्त केन्द्रीय नेतृत्व के साथ प्रदेश नेतृत्व की रस्सा-कशी के चलते राजनीतिक गलियारों में गर्मी साफ महसूस की जा सकती है।

चार साल से बगावत

राजे के खिलाफ तिवाड़ी की बगावत तो चार साल पहले उस वक्त शुरू हो गई थी जब वर्ष-2013 में हुए विधानसभा चुनाव में वे प्रदेश में सबसे ज्यादा मतों से जीते थे और इसके बावजूद उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया।

इसके बाद से ही तिवाड़ी और वसुन्धरा राजे के बीच टकराहट सरेआम हो गई। इसके लिए उन्हें कारण बताओ नोटिस भी दिया गया, लेकिन पार्टी से निष्कासन के इसलिए नहीं किया गया कि वे खुद को शहीद बताते हुए लोगों की सहानुभूति न बटोर लें।

कहीं दिल्ली का इशारा तो नहीं

तिवाड़ी के इस्तीफे को कई लोग नए प्रदेशाध्यक्ष पद को लेकर आलाकमान की राजे से रस्सा-कशी से जोड़ कर भी देख रहे हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि तिवाड़ी के इस्तीफे के बाद केन्द्रीय नेतृत्व को वसुन्धरा राजे पर दबाव बनाने का मौका मिल सकता है। जबकि कुछ लोग केन्द्र में सक्रिय तिवाड़ी के राजे विरोधी पुराने मित्रों की भूमिका भी इस प्रकरण में सूंघ रहे हैं।

कहा जा रहा है कि इनकी सलाह पर ही निष्कासन का इंतजार कर रहे तिवाड़ी ने अचानक पार्टी छोड़ने का एलान किया है ताकि राजे पर प्रदेशाध्यक्ष मुद्दे पर दबाव की राजनीति की जा सके। हालांकि इस मामले पर कोई भी नेता सामने आकर कुछ भी कहने को तैयार नहीं है।

चुनावी समीकरण और जातिगत गणित

तिवाड़ी के पार्टी छोड़ने पर हालांकि कभी उनके नजदीकी रहे प्रदेश के गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया भी तवज्जों नहीं दे रहे हैं और कह रहे हैं कि तिवाड़ी कौन सी बडी तुरूप है।

प्रदेश की नौ सीटें ब्राह्मण बाहुल्य हैं। इसके अलावा 18 से ज्यादा सीटों पर वोटर संख्या के हिसाब से दूसरे या तीसरे नम्बर पर ब्राह्मण मतदाता निर्णायक की भूमिका अदा करते हैं।

ऐसे में तिवाड़ी भले ही जातिगत मतों का फायदा नहीं ले सकें, लेकिन भाजपा सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के चलते उन्होंने जिस तरह से भ्रष्टाचार, अघोषित आपातकाल के मुद्दे उठाए हैं, उनसे वे लाभ उठाने की कोशिश जरूर  करेंगे।

 

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