ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे से उठा ज़ालिम/कहीं ऐसा न हो यां भी वही काफ़िर सनम निकले

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यह शेर ग़ालिब का नहीं अन्तिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ‘जफ़र’ का है और पहला मिस्रा यूँ है,

‘ख़ुदा के वास्ते जाहिद उठा पर्दा न काबे का’।

जफ़र के दीवान में यह शेर मौजूद है और ग़ालिब के जीवनकाल में उनके दीवान के जो पांच संस्करण छपे उनमें से किसी में भी यह शेर नहीं है और होगा भी क्यों जब शेर उनका है ही नहीं। –शीन काफ निज़ाम

(वाणी प्रकाशन से प्रकाशित दीवाने ग़ालिब की भूमिका से साभार)

अली सरदार जाफरी द्वारा संपादित दीवान ए ग़ालिब में भी पृष्ठ संख्या 157 में यह ग़ज़ल है पर उसमें उक्त शेर नहीं है। (राजकमल प्रकाशन)

नन्दकिशोर आचार्य द्वारा संपादित गालिब के दीवान में भी पृष्ठ संख्या 242-243 में भी यह शेर उल्लेखित नहीं है। (वाग्देवी प्रकाशन)

मगर शाइर गुलज़ार द्वारा निर्देशित धारावाहिक ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ में यह शेर बाकायदा जगजीतसिंह से गवाया गया है। इस मे संशय होता है कि गुलज़ार को यह सब पता न हो, और जगजीतसिंह तो वैसे भी गायक हैं उन्हें जो दिया गया उन्होंने गाया।

–अनिरुद्ध उमट, कवि-कहानीकार

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