फिल्म संजू के बहाने
———————–
एक आध साल पहले तक बेटा गुन्नु मुझे नवल कहकर ही बुलाता था। संबोधन में भी सम्मानसूचक ‘आप’ नही प्यारसूचक ‘तुम’ था। कोई दोस्त घर आता तो अपनी तेज तीखी आवाज में कहता-नवल, तेरे दोस्त आये हैंं। में हंसता, मेरे दोस्त हंसते पर मेरी मम्मी और उसकी मम्मी दोनोंं गुस्सा करतींं। धीरे धीरे फिर मेरी मम्मी और उसकी मम्मी ने एकराय होकर (जो कि सास-बहू कम ही होते हैंं) गुन्नु को टोक टोक कर मुझे नवल से पापा और उसके मासूम ‘तुम-तेरे’ सम्बोधन को ‘आप-आपके’ बना दिया, इस तरह एक प्रायोजित कारस्तानी से मेरा चिन्दी-सा एक सुख जाता रहा। हिरानी की संजू देखी तो में एक बाप और एक बेटे दोनोंं रूप में कुछ कुछ ऐसी बातेंं याद कर थोड़ा-थोड़ा भीगा हुआ था। ‘अक्टूबर’ देखकर भी बहुत रोया था। मतलब मुम्बई जाकर भी छोरा रोंदू का रोंदू रहा। हत्त।
तो बात ये कि संजू देखकर वापिस आया तो पक्का पक्का मुझे न संजय दत्त याद था न रणवीर कपूर। याद रहा एक गम्भीर जिम्मेदार बाप और एक हद दर्जे का प्यारा दोस्त कमलेश। फिल्म के ये दोनों पक्ष ही सबल हैंं। इन्हें हटा लो, आपकी संजू भरभराकर गिर जाएगी हिरानी साहब। जितनी परफेक्ट आपकी पहली तीन फिल्में थी, उससे कम पीके थी और उससे थोड़ी कम संजू। बावजूद इसके संजू उम्दा फिल्म है। बस आप भूल जाओ कि ये एक खास मकसद को लेकर बनी फिल्म है।
इसमें कैंसर से मरी संजू की पहली पत्नी ऋचा और अभी अमेरिका में रह रही बेटी त्रिशला का जिक्र भर भी नही है। न माधुरी, न बाला साहेब, न दाऊद न दाऊद के किस्से। वही दिखाया गया जो दिखाना था। फिल्म की शुरुआत से ज्यादा हैरान था। हिरानी की पिछली सभी फिल्मों की शुरुआत के 5-10 मिनिट में ही फिल्म वो गति और हिरानी ह्यूमर पकड़ लेती है जिस पर आगे फिल्म टिकी रहती है। यहां शुरुआत बेहद उबाऊ है। फिल्म के अंतिम एक घण्टे ने ही वास्तव में फिल्म को बचाया है।
हिरानी बड़ी होशियारी से फिल्म को संजय दत्त से ज्यादा बाप बेटे और दो दोस्तों के इमोशन पर ले गए और यही फिल्म की यूएसपी है। दिल जीत लिया उस बाप ने जो अपने बेटे की तमाम माफ न करने वाली गलतियों के बावजूद उसके साथ डटा रहा। उसको हर गर्त और अंधेरे से बाहर लाने के लिए। सुनील दत्त के लिए बहुत प्यार आया। भरपूर। अभिनेता भले ही औसत थे, पर इंसान बेहद उम्दा। परेश रावल की चिर परिचित टाइप्ड एक्टिंग के बीच भी महसूस किया कि सुनील दत्त किसी को पुत्तर कहकर गले लगाते होंगे तो कितना प्यार उंडेलते होंगे। लगा कि छोटे शहरों के मेरी उम्र के छोरो के बाप लोगोंं को भी अंदर ही अंदर या बहाने से प्यार या चिंता करने की बजाय थोड़ा खुलकर प्यार चिंता दिखानी चाहिए। बेटे के गले मिलकर पुत्तर-वुतर कह देंगे तो प्रलय नही आ जायेगा। दूर बैठे बेटे को ‘कोई दिक्कत तो नही’ मम्मी से पूछवाने की बजाय खुद पूछ लेंगे तो जीएसटी की रेट नहींं बढ़ जाएगी।
खैर, बैक टू मूवी। दत्त साहब की बढ़िया इमेज थी। बॉर्डर पर तनाव होता तो फौजियों के पास पहुच जाते। दंगे हुए तो पीड़ितों के पास। फिल्म लाइन से जुड़े छोटे छोटे तकनीकी लोगों का भी काफी ध्यान रखते मतलब एक अच्छी खासी इमेज बना ली थी जिस पर बट्टा लगाने के लिए ही शायद संजू बाबा को दुनिया में आना था। कहांं तो बिना सींग की गऊ माता जैसे सुनील दत्त और कहा बिना नागा किये हर दो तीन साल में कोई न कोई कांड करने वाले बिगड़ेल संजू। सुनील दत्त की इस रूप में भी इज्जत हो कि उन्होंने अपनी इमेज के चक्कर में आतंकवादी घोषित कर दिए गए बेटे को अकेले न छोड़ा। ये दोहरी जंग थी जो उन्होंने अकेले लड़ी। एक आदर्शवादी इंसान और एक बिगड़ेल बेटे के जिम्मेदार बाप का रोल उन्होंने साथ साथ अच्छे से निभाया।
सिक्सर। वेल प्लेड दत्त साहब।
क्लाइमेक्स में संजय दत्त अपने बेटे से कहता है कि उसकी कहानी दो बाप की कहानी है। एक तेरे बाप की और एक मेरे बाप की। तू अपने बाप जैसा मत बनना, मेरे बाप जैसा बनना।
सिक्सर। वेल प्लेड संजू।
फिल्म में सुनील दत्त मरते हैंं और संजू कहता है कि वो उन्हें थैंक्यू नही बोल पाया। अपने हर उस पल के लिए जब उन्होंने उसका साथ दिया। बोला, काश में लाइफ रिवाइंड कर पाता और थैंक यू बोल पाता। हिरानी के जादू की झप्पी और ऑल इस वेल जितना मुखर न सही, पर साफ संदेश था कि उन सभी अपनोंं को अपनी फीलिंग बताने में देर मत करो जिनको आप प्यार करते हो, जिनसे आपका स्नेह है। कब आपका थैंक्यू-सॉरी-लव यू सुनने वाला बिना बताये अचानक चला जाये, क्या पता।
फिल्म का दूसरा उजला पक्ष था संजू-कमलेश की दोस्ती को दिखाना। रिलीज से पहले कही पढ़ा था कि ओरिजनली संजय दत्त के जीवन के अलग अलग मौकोंं पर अलग अलग दोस्तोंं ने उसकी मदद की। फिल्म की सहूलियत और स्क्रिप्ट में इमोशन को डालने के लिए इसे एक ही किरदार कमलेश बनाया गया जिसे हिरानी के ह्यूमर और विकी कौशल के अभिनय ने कमाल का बना दिया। यकीनन ये फिल्म रणबीर का बेस्ट है और अब निर्विवाद रूप से कह सकते हैंं कि कपूर खानदान का सबसे उम्दा अभिनेता रणबीर ही है पर फिल्म में रणबीर से ज्यादा अच्छा काम विकी कौशल ने किया है। विकी समझदार है, अंडरप्ले करता है। अपने को बहुत कम खर्च कर रहा है। उसमे वैरायटी और फ्लेवर भी ज्यादा है तो टाइप्ड होने से बचने की उम्मीद भी है।
फिल्म में अंत से पहले एक सिचुवेशन में संजू अपने दोस्त के लिए ‘तेरे जैसा यार कहां… गाना बजाता है और उस पल संजय दत्त बने रणबीर का जो एक फ्रेम हिरानी ने लिया है, वो जबर है। हिरानी इस तरह के फ्रेम से हमेशा बचते हैंं। वो ऐसे कैमरा एंगल लेते ही नही जिससे दर्शकोंं को निर्देशक या कैमरामेन याद आये। वो पात्रोंं और दर्शक के बीच कुछ भी नही आने देते। तो फ्रेम है कि संजू अपने जीवन के तमाम अच्छे-बुरे कामों, अनुभवों, उठा-पटक के बाद सजा काटते हुए जीवन की सांझ के मुहाने बैठा कंधे और नजरेंझुकाये रेडियो कंसोल पर भीगी आंखों से अपने दोस्त को याद कर रहा, शांतचित। न कुछ पाने की उम्मीद न कुछ हो जाने और खो जाने का डर। दोस्त को कहता है कि चाहता हूं कि जेल से बाहर आऊंं तो तू मिलने आये। नही भी आया तो कोई ना, तेरी अच्छी मेमोरी हमेशा मेरे साथ रहेगी। आपके जीवन में भी अच्छे दोस्त हैंं, उनसे जुड़ी यादेंं हैंं, उनके साथ किये काले कारनामे हैंं, उनसे जुड़ी लड़ाईया और सुख दुख हैंं तो हिरानी की संजू को उसके तय एजेंडे के बावजूद आनंदित होकर देखा जा सकता है।