गत दिनों राजस्थान सरकार की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने देशनोक में करणी माता के पैनोरमा का उद्घाटन किया था किन्तु सभ्य समाज में यह तर्क दिया जाता है कि जहां पर निर्वाण स्थल होता है पैनारमा का अधिकार वहां पर अधिक होता है ऐसा मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है। https://thenews.mobilogicx.com
बीकानेर से 95 किलोमीटर जैसलमेर रोड़ एन.एच. 15 से अन्दर लिंक रोड पर करणी माता निर्वाण स्थल ग्राम गडिय़ाला में स्थित है जहां पर नवरात्रि में विधिवत रूप से पूर्जा अर्चना एवं अनुष्ठान किया जाता रहा है। परम्परागत मान्यताओं के अनुसार राजाशाही राजकालीन समय में बीकानेर राजा एवं जैसलमेर राजा के मध्य सीमाओं को लेकर लम्बे समय तक विवाद रहा और कई युद्ध हुए और कई लोगों की जानें भी गई उक्त गम्भीर मामले को देखते हुए बीकानेर एवं जैसलमेर राज्य की हितैषी मां करणी विवाद का निपटारा करने गडिय़ाला ग्राम में स्थित धनेरी तलाई के पास पहुंची और विवाद का समाधान दोनों पक्षों को बैठाकर करवाया।
उस समय करणी माता की आयु करीब 150 वर्ष के करीब थी काफी वक्त गुजरने के बाद एक दिन करणी माता ने अपने पुत्र एवं सारंग बिश्नोई, एक मेघवाल चाकर को बुलाया और धनेरी तलाई से झारी में साफ जल भरकर लाने को कहा और एक पत्थर पर बैठ गई उनके आदेशानुसार चाकरों एवं पुत्र ने झारी से उनके सिर पर पानी उड़ेला तो करणी माता दिव्य ज्योति बनकर प्रकृति में विलीन हो गई और उस दिन के बाद से कहा जाता है कि उक्त पत्थर के इस तरफ बीकानेर और उस तरह जैसलमेर की सीमा निर्धारित कर दी गई। उक्त पत्थर आज भी करणी माता मन्दिर निज मन्दिर में रखे हुए हैं जो वाकयी में दिव्य प्रतीत होते हैं। https://thenews.mobilogicx.com
प्राप्त जानकारी के अनुसार सर्वप्रथम उक्त मन्दिर में पूर्जा अर्चना कई दशकों पूर्व डाकू माधोसिंह भाटी ने शुरू की एवं उक्त मन्दिर पुरे क्षेत्र में डाकुओं के मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध रहा उस समय उक्त मन्दिर थान (छोटे मन्दिर) के रूप में था। काफी समय बाद उक्त मन्दिर में पूजारी के रूप में बंशीवाला बाबा ने कई दशकों तक खुब सेवा अर्चना की उनके बारे में तत्कालीक लोगों का कहना था कि या तो वो रिटायर्ड फौजी थे या तडि़पार अपराधी थे पर उनकी मृत्यु तक वे कौन थे इसकी मूल जानकारी किसी के पास नहीं है। उनकी मृत्यु के बाद मन्दिर के द्वारा के सामने 200 फीट दूर उनकी समाधि भक्तों के माध्यम से बनाई गई जो आज भी वहां स्थित है और लोग माथा टेकते हैं।
गडिय़ाला मन्दिर का जीर्णोंद्धार पूर्ण मन्दिर के रूप में करणी माता भक्त जुगल किशोर माली मालिक फनवल्र्ड वाटरपार्क नाल ने करवाया। माली ने उक्त जीर्णोद्धार में करीब एक करोड़ रूपये के आस पास राशि खर्च की।
उक्त मन्दिर में नवरात्रि स्थापना के प्रथम दिन रावला (गडिय़ाला के रावलोत भाटियों) के मुख्य परिवार द्वारा विधिवत पूजा अर्चना कर भोग लगाकर नवरात्रि की शुरूआत की जाती है और यह परम्परा वर्षों से यहां कायम है।
एक बार की बात है जब अंग्रेजों के शासन काल में नमक बनाने को लेकर या नमक की जमीन को लेकर अग्रेजों के द्वारा एकतरफा कार्यवाही करके दण्ड का प्रावधान था तो गडियाला ग्राम के रावला परिवार के सदस्य दीपसिंह रावलोत भाटी ने उक्त समस्या के बारे में करणी माता मन्दिर गडिय़ाला में पूर्जा अर्चना की और देवी से प्रार्थना की वे कुछ करें। तो तत्कालीक लोगों कहना था कि उक्त नमक की जमीन ऊपर से तो सफेद रह गई और अन्दर से मिट्टी हो गई यह वाकया आज तक गांव वालों के मध्य चर्चा का विषय है।
गडिय़ाला मन्दिर की प्रसिद्धि देशनोक, सुआप एवं साठिका के बजाय कमतर इसलिए है कि इसका व्यापाक स्तर पर प्रचार प्रसार नहीं किया गया जिसके चलते करणी भक्तों को उक्त मन्दिर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। किन्तु गत कई वर्षों में राजपूत, ब्राहमण एवं ओबीसी वर्ग के युवाओं ने उक्त मन्दिर के प्रचार प्रसार करने का बीड़ा उठाया जिसके चलते मन्दिर में श्रद्धालुओं का तांता लगने लग गया है।
मेरा करणी माता के भक्तों से इतना ही आग्रह है कि देशनोक, सुआप एवं साठिका के बराबर उक्त करणी माता मन्दिर मठ का महत्व समानान्तर रूप से है सभी इस जानकारी को आगे से आगे लोगों को अवगत करवाए ताकि उक्त चमत्कारी करणी माता निर्वाण स्थल, गडिय़ाला के बारे में लोगों को अधिक से अधिक मालुम चल सके एवं लोग नवरात्रि में अपनी अराध्यी देवी करणी माता के दर्शन कर सके।
लेखक:- डूंगरसिंह तेहनदेसर, सामाजिक विषयों पर गत वर्षो में लगातार रूप से लेखन।