अबोधता में संभव प्रेम की कुछ परिपक्व अभिव्यक्तियां

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पुस्तक समीक्षा :

हिंदी की प्रेम कहानियां

कुछ शब्द अपने विस्तार के कारण इतने गूढ़ हो जाते हैं कि उनकी सरलता भी छलावा-सा प्रतीत होती है। प्रेम भी एक ऐसा ही शब्द है। इस ढाई आखर की गहराई तो कोई तब समझे, जब थाह पा ले कि यही तल है। इसे तो जितना प्राप्त करते हैं, कम ही जान पड़ता है। इस बीच अगर हमारे पास ‘हिंदी की प्रेम कहानियां’ जैसा संकलन हो तो जानिये एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। सर्जना, बीकानेर की ओर से प्रकाशित इस संकलन को प्रेम अरण्य-1 के रूप में प्रस्तुत किया गया है तो जाहिर है कि यह शृंखला के रूप में पाठकों के बीच आना है। ऐसे में भले ही यह पहला प्रेम अरण्य हो और इससे जाहिर होता हो कि ऐसे अरण्य शृंखलाबद्ध मिलेंगे, लेकिन पहला अरण्य भी किसी भूल-भुलैया से कम नहीं है।

पाठक अपने मन में बसाए प्रेम से जब इन कहानियों के प्रेम की तुलना करता है तो बार-बार प्रेम संबंधी अपनी मान्यताओं का खारिज करता हुआ एक नए प्रेम और फिर प्रेम ही प्रेम में रच-बस जाता है।

यकीनी तौर पर यह डॉ. सुचित्रा कश्यप की सफलता है कि उन्होंने बड़ी ही कुशलता से नौ कहानियों को इस तरह पिरोया है कि प्रेम से अपरिचित लोग प्रेम से परिचित होते नजर आते हैं, लेकिन उन लोगों का हौसला चूक जाता है, जो प्रेम-विशेषज्ञ माना जाते हैं। हिंदी की एसोसिएट प्रोफेसर और साहित्यानुरागी होने के कारण उनका यह प्रयास न सिर्फ विश्वसनीय है बल्कि प्रामाणिक है। इन कहानियों में प्रेम इतने रंग में अभिव्यक्त हुआ है कि अर्थ-मीमांसा की बजाय अनुभूति का आश्रय लेना ही श्रेयस्कर प्रतीत होता है। जो कहानीकार इसमें नहीं हैं, उनकी बजाय जो हैं, उनकी कहानियों के आधार पर अगर प्रेम के कल, आज और कल को समझना चाहें तो अतृप्ति नहीं होती, रंजन ही होता है।

एक पाठक के तौर पर मेरे साथ भी यही हुआ और कहानी-दर-कहानी प्रेम-यात्रा का आनंद लेता रहा। हां, इस अरण्य में यह यात्रा ही तो है। पं.चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, जयशंकर प्रसाद, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, शैलेश मटियानी, सत्येन कुमार, प्रियंवद, जया जादवानी, हिमांशु जोशी और रवींद्र कालिया की अलग-अलग समय में लिखी कहानियों को इस संकलन में इस तरह निबद्ध किया गया है कि हर कहानी अपने स्वतंत्र अस्तित्व के बावजूद एक अंतर्धारा से जुड़ी हुई लगती है, जिसे प्रेम कहा जा सकता है।

संभव है बहुत सारे पाठकों ने इन कहानियों को पहले भी पढ़ा हो, लेकिन एक श्रेणी के साथ पुनर्पाठ करते हुए जब पाठक नए सिरे से यहां प्रेम तलाशने के लिए निकलता है तो पहले के पाठ में बहुत कुछ छूटा हुआ भी बरामद कर लेता है। एक दृष्टि के साथ पढ़ने के लिए अपने फायदे-नुकसान है। मेरा मानना है कि डॉ. कश्यप ने प्रेम की ओट से प्रस्तुत करते हुए इन कहानियों को एक नया जीवन दिया है। वरना भले ही ‘उसने कहा था’ कि बात करें या ‘आकाशदीप’ की। हिंदी के पाठकों ने इसे एक कहानी से अधिक अपने जीवन की कहानी के रूप में भी माना है।

‘उसने कहा था’ कहानी तो कुछ कम-ज्यादा की बहस में पड़े बगैर एहसास की कहानी है। इसी तरह ‘आकाशदीप’ कहानी जैसे अंर्तद्वंद्व से पाठक जाने कितनी-कितनी बार निकलता है। ‘कानों के कंगना’ में प्रेम जब बरामद होता है, तब तक बहुत कुछ खत्म हो चुका होता है। सच ही तो है, बहुत सारे तो प्रेम को समझ ही नहीं पाते और जब समझ आता है, समय बीत जाता है। इस रूप में प्रेम को भले ही पूर्णता नहीं मिली हो, लेकिन उसका होना आखिरकार काम आता है। संवेदनाओं के शिखर पर ले जाती है शैलेश मटियानी की कहानी ‘अर्द्धांगिनी’। मन्नतों के धागे से बंधे विश्वास को अभिव्यक्त करती इस कहानी में प्रतीक्षा का जो अनहद-नाद है, बावरा मन ही सुन सकता है।

सत्येन कुमार की कहानी ‘खुशबू’ संशय, जिद और डाह से उपजी एक ऐसी कहानी है जहां उम्र महत्वहीन है। सवाल खड़ा होता है तो फिर यहां किस बात का महत्व है? एक आकर्षण में बंधी नवयुवती की अधीरता में धीर इस कहानी का प्राणतत्त्व है।

प्रियंवद की कहानी ‘नदी होती लड़की’ गहरे अर्थ लिए हुए हैं। ऊपरी तौर पर यह कहानी जिसे चाहा, उसके नहीं मिलने और मिलने के घिसे-पिटे कथानक को लेकर आगे बढ़ती है और कुछ ही देर में जो नहीं मिला उसे मिला भी देती है और पति को इस बात का पता भी चल जाता है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में फोड़े का दो बार अलग-अलग परिस्थितियों में आधा-आधा फूटना और सारा मवाद निकल जाना, गहरी व्यंजना है। एक तो फोड़ा और फिर फोड़े वाली जगह, सोचने के लिए खुली छूट देती है। यहां बहुत सारी बातें अनकही है। पाठक सोचने के लिए स्वतंत्र है।

जया जादवानी की ‘बर्फ के फूल’ में अधेड़ उम्र के आने के बाद भी प्रेम की गरमास का अहसास है। अंकल-आंटी बन चुके किरदार अपना परिवार छोड़कर एक होना चाहते हैं। होते भी हैं, लेकिन इस मिलन को रिश्ते का नाम देने के बीच में लोकाचार दीवार बन जाते हैं। कहानी का अंत बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। इस कहानी में एक संवाद प्रेम परिभाषित करने की एक कोशिश करता है कि प्रेम न सिर्फ अबोध होता है, अबोधता में ही संभव होता है। समझदारी से इसका कोई लेना-देना नहीं।

हिमांशु जोशी की कहानी ‘सागर तट के शहर’ चाहत और टूटन के बीच घटित होने वाले ऐसे पलों की कहानी है, जहां सब कुछ एक हाथ की दूरी पर नजर आता है, लेकिन हासिल पीड़ा ही होती है। प्रेम और पीर की इस जुगलबंदी में अक्सर पीर ऊंचा आलाप लेती है, जिसे विलाप के रूप में ग्रहण किया जाता है।

रवींद्र कालिया की कहानी ‘तीस साल बाद’ इस संग्रह की आखिरी कहानी है और आकार में छोटी भी, लेकिन यहां जो अभिव्यक्त हुआ है, उसे समझने के लिए कहानी के उन कपाटों को खोलना बहुत जरूरी है, जो अनाभिव्यक्त हैं। यह कहानी अतीत के पन्नों में छिपे गुलाब जैसी है, जहां महक नहीं होने के बाद भी जो होता है, उसे कसक में महसूस किया जा सकता है।

कहें तो ये कहानियां प्रेम की कुछ अबूझी गलियों में ले जाने का काम करती है। हालांकि यहां देह-राग है, आकर्षण के तार हैं, स्मृतियां हैं, व्यवहार हैं–लेकिन अचानक से इन सभी के बीचे से कुछ उजला-सा महसूस होता है, जिसे प्रेम के रूप में समझा जा सकता है। यहां प्रेम के हिंदी में होने के अर्थ को समझने का प्रयास किया जाए तो यह कहने को जी चाहता है कि इन कहानियों का चयन करते समय जरूर इस बात का ध्यान रखा गया होगा कि इसमें हिंदी रहे, देश रहे, देश का परिवेश रहे और इस बात के लिए संपादक डॉ. सुचित्रा कश्यप को बधाई कि उन्होंने शीर्षक को संगत साबित किया। 192 पेज के इस संकलन के लिए यह कहा जा सकता है कि इन कहानियों से निकलने वाला पाठक प्रेम के प्रचलित जोड़-बाकी की व्यर्थता को न सिर्फ समझेगा बल्कि अधिक गुणात्मक यहां प्राप्त करेगा। हालांकि, कहानियों से अधिक गूढ़ पुस्तक का कवर है, जहां रेखाओं और रंगों में अधिक मुखर होने की होड है। भले ही देर तक देखने के बाद यहां कुछ हासिल नहीं हो, लेकिन बार-बार यह लगता है कि यहां कुछ है। और इस कुछ की आस में पाठक किताब में प्रवेश करता है। कदाचित, यही प्रेम है।

–हरीश बी. शर्मा

(पुस्तक का मुुुल्य 120 रुपए है)

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