देव गये सोने : चार महीने सृष्टि शिव के जिम्मे, शुभ कार्य निषेध

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23 जुलाई को देवशयनी एकादशी

बीकानेर। गत 16 जुलाई को सूर्य ने कर्क में प्रवेश कर लिया इसलिए इसे कर्क संक्रांति भी कहते हैं। सूर्यदेव के साथ ही अन्य देवता भी निद्रा में चले गए हैं। पं. सूर्यप्रकाश गौतम ने बताया कि अब चार महीने सृष्टि का भार भोलेनाथ संभालेंगे, श्रावण मास में शिव आराधना का महत्व इसीलिए बढ़ जाता है।

28 जुलाई को श्रावण मास प्रारंभ होने से पूर्व 27 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के अलावा चंद्र ग्रहण भी है। लेकिन बाद इसके मेलों, व्रत व त्योहारों की जो शृंखला शुरू होगी वह वर्षपर्यंत जारी रहेगी।

पं. गौतम ने बताया कि कर्क संक्रांति से भगवान विष्णु के पूजन का खास महत्व है यह पूजन एकादशी तक निरंतर जारी रहता है क्योंकि इस एकादशी के दिन विष्णु देव शयन आरंभ कर देते हैं। इसीलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं। यह एकादशी 23 जुलाई है तथा इस दिन से देव 4 महीनों के लिए शयन को चले जाते हैं।

कर्क संक्रांति में नए कार्य शुरू करना शुभ नहीं माना जाता है। इस समय किए जाने वाले कार्यों को देवों का आशीर्वाद नहीं मिलता।

सूर्य प्रत्येक राशि में संक्रमण करते हैं इसलिए 12 संक्रांतियां होती हैं। इनमें मकर संक्रांति और कर्क संक्रांति का विशेष महत्व है। जिस तरह मकर संक्रांति से अग्नि तत्व बढ़ता है, चारों तरफ सकारात्मक और शुभ ऊर्जा का प्रसार होने लगता है, उसी तरह कर्क संक्रांति से जल तत्व बढ़ता है जिससे वातावरण में नकारात्मकता आने लगती है। दूसरे शब्दों में सूर्य के उत्तरायन होने से शुभता में वृद्धि होती है वहीं सूर्य के दक्षिणायन होने से नकारात्मक शक्तियां प्रभावी हो जाती हैं और देवताओं की शक्ति कमजोर होने लगती है। यही वजह है कि दक्षिणायन से आरंभ कर्क संक्रांति से चातुर्मास आरंभ हो जाता है और शुभ कार्यों की मनाही हो जाती है। दान, पूजन और पुण्यकर्म फलदायी होते हैं।

कार्यभार आपस में बदलते हैं

पं. सूर्यप्रकाश गौतम ने बताया कि वास्तव में यह एक पारंपरिक धारणा है कि सृष्टि का कार्यभार संभालते हुए भगवान विष्णु बहुत थक जाते हैं। तब माता लक्ष्मी उनसे निवेदन करती है कि कुछ समय उन्हें सृष्टि की चिंता और भार देवों के देव महादेव को भी देना चाहिए। तब हिमालय से महादेव पृथ्वीलोक पर आते हैं और 4 मास तक संसार की गतिविधियां वे ही संभालते हैं। इसके उपरांत शिव पुन: कैलास की तरफ रुख कर लेते हैं, यह दिन भी एकादशी का ही होता है, जिसे देवउठनी एकादशी या देवप्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। यह दिन हरि-हर के मिलन होता है। देव अपना कार्यभार आपस में बदलते हैं। चुंकि शिव गृहस्थ होते हुए भी संन्यासी हैं अत: उनके राज में विवाह आदि कार्य वर्जित माने गए हैं लेकिन पूजन और अन्य पर्व धूमधाम से मनाए जाते हैं।

वैसे देवताओं का सोना प्रतीकात्मक ही होता है। इन दिनों कुछ शुभ सितारे भी अस्त होते हैं जिनके उदित रहने से मंगल कार्यों में शुभ आशीर्वाद मिलते हैं। अत: इस काल में सिर्फ पुण्य-अर्जन और देवपूजन का ही प्रचलन है।

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